कुछ उदासियाँ कुछ थकान ….!

कुछ उदासियाँ कुछ थकान घर लाया
लौट कर जब भी में अपने घर आया

सुबह से शाम हो गयी नोकरी की तलाश में
मुनियाँ को रोते तो बीबी को उदास पाया

पिताजी कहते है कि निकम्मा है “अजय”
माँ ने पुचकारा सही सलामत तो लौट आया

किस से क्या कहूँ ,किस को क्या बतलाऊँ
में अपने सपनों को रास्ते मे कहीं छोड़ आया ..

कवि – अजय बजरँगी

अबकी बाढ़ में …

अबकी बाढ़ में मेरा सब कुछ बह गया
जहाँ मकां था अब बस निशां रह गया

बांध हर बार बनते हैं बनते ही टूट जाते हैं
सरकार निकम्मी है राहगीर कोई कह गया

हर तरफ तबाही का मंज़र देखकर “अजय”
हिर्दय मेरा भी द्रवित हो पानी मे बह गया

शासन , प्रशासन सब मुस्तेद है बचाव में
हर संभव मदद मिलेगी विधायक एक कह गया

लेखक – अजय बजरँगी

दोनों बाजुओं को काट कर …….!!

दोनों बाजुओं को काट कर
एक नया भेष बना दिया
इधर पकिस्तान तो
उधर बंग्लादेश बना दिया ,

में पूछता हूँ छाती ठोक कर
आखिर ऐसा क्यों किया
मेरे एक वतन को तूमने
तीन जगह क्यों बांट दिया ,

भगत सिंह मंगल पांडेय
की आत्मा है पूछती
क्या इसी लिए हमने हँसते हँसते
फंदा फांसी का चुम लिया ,

क्या मजबूरी थी तुम्हारी
आखिर क्या थी चाल
लड़ाई तो “आज़ादी”की थी
तुमने मज़हब में क्यों बाँट दिया ,

लाखों शहीदों की चिताओं
की अग्नि को “अजय”
क्या साक्षी मान कर
तुमने ये सारा फैसला लिया ,

आज भी सब मज़हब रहते हैं
मेरे प्यारे हिन्दुस्तान में
मज़हब के नाम पर बंटवारा
फिर तुमने क्यो कबूल किया ,

पूछता है आज हर हिन्दुस्तानी
बंटवारा क्या जनता को कबूल था
या फिर सत्ता की लालसा में ये
घिनोना पाप अपने सर लिया ….

लेखक – अजय बजरँगी

कुछ ऐसे भी कुछ वेसे भी …

कुछ ऐसे भी , कुछ वेसे भी
सब अच्छे हैं ,”अजय” हो कैसे भी
कुछ कट गए ,कुछ कट जाएंगे
“दिनों” का क्या है , हो जैसे भी..

कुछ खट्टे भी , कुछ मीठे भी
कुछ कड़वे भी , कुछ फीके भी
कुछ आ गए , कुछ आ जाएंगे
“सपनों” का क्या है ,हो जैसे भी…

कुछ प्यारे से , कुछ शरमीले
कुछ हठीले , कुछ नखरीले
कुछ बिछड़ गए , कुछ मिल जाएंगे
“मित्रों” का क्या है , हो जैसे भी…

कुछ जाने से , कुछ पहचाने से
कुछ अपने से , कुछ अनजाने से
कुछ निभ गए , कुछ निभ जाएँगे
“रिश्तों” का क्या है , हो जैसे भी…

कुछ ऐसे भी , कुछ वेसे भी
सब अच्छे हैं ,” अजय” हो कैसे भी…

लेखक – अजय बजरँगी

अजय बजरँगी

होगी तुम्हारे शहर की शान आलीशान …..

होगी तुम्हारे शहर की बिल्डिंगे आलीशान
पर मेरे गांव जैसा एक भी मकान नही है

सुना है तुम्हारे शहर में तहजीब बहुत है
पर मेरे गांव जैसी मीठी सी ज़ुबान नही है

“अजय”हम सब दुःख-सुख में साथ रहतें है
नफ़रत की मेरे गाँव मे कोई दुकान नही है

“बजरँगी”सारे मज़हब -जातियां बैठें एक साथ
चौपाल मेरे गांव जैसी कोई आलीशान नही है

अजय बजरँगी

मेरे राम …..!!

बड़े संघर्षो से आज़ादी हमने पाई है
विराजो रामलला शुभ घड़ी आई है

वाट निहारत सब अयोध्या के वासी
मंगल बेला देखो आज हर घर छाई है

पूण्य भूमि ये भारत भूमि धन्य हुई
भरत शत्रुध्न लक्ष्मण से मिले भाई हैं

साक्षी बने आज हम ,जीवन हुआ सफल
जिंदगी तू भी क्या क्षण जीवन मे लाई है

अब “अजय” और “राम”से क्या माँगू में
“बजरंगी” ने सारी भक्ति तुम पर लुटाई है

लेखक – अजय बजरँगी

सत्ता की ख़ातिर …

धृतराष्ट ने सत्ता की ख़ातिर
अपने सौ पुत्रों को वारा था
पुत्र मोह में कैकयी जिद में
दशरथ जीवन से हारा था…

सत्ता की ख़ातिर युद्ध हुऐ
भाई ने भाई को हरवाया था
भाई विभीषण ने रावण को
सुग्रीव ने बाली को मरवाया था…

सत्ता की ख़ातिर राजाओं ने
मुग़लो का साथ निभाया था
कुछ काली चमड़ी वालों ने
गोरों को राज दिलवाया था …

सत्ता की ख़ातिर कुछ लोगों ने
पता “आज़ाद” का बताया था
भगतसिंह , सुखदेव ,राजगुरु को
फाँसी के फंदे पर झुलवाया था ..

@अजय बजरँगी

राम के अग्निबाण हो तुम ,हनुमत से बलशाली हो ….!!

वतन की ख़ातिर ,मर मिटने को जो तैयार नही
उन्हें इस देश मे रहने का कोई अधिकार नही

उठो जागो निन्द्रा तोड़ो , भारत माँ की यही पुकार है
हर हुँकार तुम्हारी , रानी लक्ष्मीबाई की तलवार है

हर दुश्मन को बतला दो तुम किससे पड़ा पाला है
हर हिंदुस्तानी के हाथों में अब, महाराणा का भाला है

दिखला दो दुश्मन को तुम भी कितने शक्तिशाली हो
राम के अग्निबाण हो तुम , हनुमत से बलशाली हो

लेखक – अजय बजरँगी

आसमान के ग्रहण को ..

आसमान के ग्रहण को तो समझ गये…
ज़मीन पर ग्रहण के भेद कौन खोलेगा…

कैसे इंसान की , इंसानियत मर गयी
इसका बात का भेद कौन खोलेगा …

जयचंद आज भी मेरे देश मे बहुत है
कौन सा जयचंद अपने आप बोलेगा…

कुछ लोगों के दामन पर दाग है लहुँ के
देखो कौन उनको अपने आप धौ-लेगा..

लेखक – अजय बजरँगी

मेरे हिस्से का “हिस्सा”..

ज्येठ की तपती दुपहरी में
परिन्दे भी परेशान थे ,
मेरे हिस्से का “सूरज” निकला
ही नही लोग भी हैरान थे

सारी ज़िन्दगी तरसता रहा कि
कभी तो आएगी उजयारी रात
मेरे हिस्से का “चाँद” निकला
ही नही लोग भी हैरान थे

उम्र भर कुआँ खोदता रहा
दुनियां की प्यास बुझाने को
मेरे हिस्से का “पानी” निकला
ही नही लोग भी हैरान थे

बाबूजी ने किया बंटवारा
सब के हिस्से कुछ न कुछ आया
मेरे हिस्से का “हिस्सा” निकला
ही नही लोग भी हैरान थे

लेखक – अजय बजरँगी