शायद में ही अपराधी हूँ …?

ग़रीबी के बोझ तले
उस गरीब
ब्राह्मण सुदामा
की तरह ही
एक अधूरा जीवन जी रहा ,

बस पेट भरने
के लिए
दो मन्त्र क्या
पढ़ ,सीख लिए
यही पढ़ना और
पढ़ाना , मेरे लिए श्राप
बन गए ,
इससे अच्छा तो
भीख माँग कर पेट भरता ,

कम से कम इस
कलयुग में
ऊंची जाति का
श्राप तो न लगता मुझे ,

लोग मनुवादी कहकर
मेरा मजाक तो
नही उड़ाते ,ब्राह्मण
होने का दन्ड
तो नही भुगतना
पड़ता ,

कुछ लोग कहते हैं
कि ये जातियां मेने बनायीं है
कुछ लोग गाली
देतें है कि
खुद को ऊँची ओर
मुझे नीची जाति में क्यों रखा ?

इसलिए मैंने अब
अपने नाम के साथ
पँडित लगाना छोड़ दिया है ,

क्या जबाब दूँ
आज किसी की बात का
कोई जबाब नही है
निरुत्तर हूँ
निःशब्द हूँ
शायद में ही अपराधी हूँ !!

@अजय बजरँगी

वतन को सलामत कर …..!


वतन को सलामत कर,शरीर छोड़ आयें हैं
आत्मा वहीं हैं बस अब,प्राण छोड़ आयें हैं

मेरे देश के आँगन में अब सब महफूज रहें
इसलिए घर का आँगन सुना छोड़ आयें हैं

मत ढूढ़ना मुझे किसी गली किसी मोड़ पर
सरहदे वतन पर हम निशान छोड़ आयें हैं

अब कर दिया है तुम्हारे हवाले वतन साथियों
ख़ुद बुझ कर तुम्हारे लिए ये दिए जलाएं हैं

@अजय बजरँगी

सबका देश है ये हिन्दुस्तान ..!

अब मेरे जख्मों का तू हिसाब न पूछ
किसने दिये जख्म उसका नाम न पूछ

मेरे हर टुकड़े पर हिन्दुस्तान लिखा है
किसने बाँटा मेरे वतन को नाम न पूछ

कुछ अपने थे, कुछ गैर थे, बाँटने वाले
बहुत बेनक़ाब हो जाएंगे,उनका नाम न पूछ

अपना लहू तो लहू,दूसरों का लहू पानी
ऐसी सोच के ग़द्दारों का तू नाम न पूछ

लगें हैं आज भी बाँटने वो रहनुमा बनकर
होगा कहीँ आस पास तेरे तू नाम न पूछ

सबका देश है ये हिन्दुस्तान सब कहते हैं
सन सैतालीस के दोषी का तू नाम न पूछ

ग़द्दारों की सजा फाँसी हैं लटका दो सबको
जो खिलाफ हो मुल्क के उसका नाम न पूछ

@अजय बजरँगी

है श्री कृष्णा…!

है,
श्री कृष्णा
अब बाँसुरी नही
चक्र सुदर्शन उठा लो तुम
दुनियां में पिशाचों की
की संख्या कुछ
ज्यादा बढ़
गयी
है ……

@अजयबजरँगी

किस सत्ता के लालच में …?

अब मेरे जख्मों का तू हिसाब न पूछ
किसने दिये जख्म उसका नाम न पूछ,


तुम और
तुम्हारा वो कानून
मेरे व मेरे आने वाली
पीढ़ी के दुश्मन
क्यों हो गए ?

तुम्हारी कलम ने
मुझे और मेरी आने वाली
पीढ़ी को श्रापित
क्यों कर दिया ?

तुम्हारे
इस श्राप से
क्या कभी में ओर मेरी
आने वाली पीढियां
मुक्त हो पायेंगी ?

तुम जानते थे
क्या ? कोई गरीब ब्राह्मण
नही है , ना कभी
पैदा होगा ?

तुमने उस
पवित्र महाग्रन्थ
सविंधान में मुझे ओर
मेरी आने वाली पीढ़ी को
कहाँ दो गज जमीन
दी है दफन होने
के लिए ?

तुमने
उस आरक्षण रूपी
राक्षस से
मेरा ओर मेरी
आने वाली पीढ़ी का
वध क्यों करवाया ?

कौन दोषी है
उन हजारों अबोध
भोले बच्चों की आत्महत्या,
या मानू उनकी हत्या ,
जिन्हें तुम्हारे उस
राक्षस आरक्षण
ने अपनी बली बना लिया ,

किस सत्ता के लालच में?
तुमने ऐसा जघन्य कृत्य किया
इन प्रश्नों पर तू मौन क्यों है?
बोल भी$$$$बोल
कुछ तो बोल ?

@अजय बजरँगी

पुरुषों ने क्या किया …?

पुरषों ने क्या किया ?

कन्याओं ने इच्छित
वर के लिए
तपस्याएं की ,लेकिन
किसी पुरुष ने किसी कन्या
के लिए तप नहीं किया ,

ये कहानियां पुरुष
वर्चस्व को प्रमाणित करती हैं, परंतु
स्त्रियां, पुरुष मनोभावों को
जितनी जल्दी
समझ लेती हैं, पुरुष
आजीवन साथ रहते हुए भी
स्त्री-मनोभाव को नहीं समझ सका ,

पुरुष शासक होने का दंभ
भले पाले, लेकिन
वह अक्सर
स्त्री से ही शासित होता रहा है ,

किसकी चलती है?
उसी की सलाह और
संकेतों पर इतिहास और संस्कृतियां बदली हैं,

सभ्यता के उस युग की
हम प्रतीक्षा करेंगे
जब बेटे वाले अपनी संतति के
विकास के लिए
किसी की बेटी का हाथ
मांगने अनुनय विनय के साथ जायेंगे
और बेटी का बाप
संसार का छोटा आदमी, निरीह
और दया का पात्र
नहीं समझा जायेगा और धरती
के सारे देवतागण
उसके सामने नतमस्तक,
दक्ष की कन्याओं का हाथ
मांगने के लिए कतारबद्ध खड़े रहेंगे !!

सफेद कागज पर काला झूँठ …!

सफेद कागज पर काला झूँठ
ज्यादा दिन नही चलता….

ऊपर वाले की अदालत में
कभी फैसला नही बदलता….

ख़ुद अगर न बिको तो जमीर पर
ज़ोर ख़रीदार का नहीं चलता….

झाड़ियों के इस जंगल में इंसान
एक भी बरगद सा नही मिलता….

जब कलम कहती है,लिख देता हूँ
कविता पर अब,मेरा जोर नही चलता….

@अजय बजरँगी