करो नियंत्रण जनसँख्या को ये सबसे बड़ी बीमारी है …

पानी के लिए तरस रहे थे
अब हवा की मारामारी है
अगर नही जागे अभी तो
आगे भूख की हाहाकारी है

करो नियंत्रण जनसँख्या को
ये सबसे बड़ी बीमारी है ….

बहुत तरक्की कर ली तुमने
फिर भी प्रकृति से हार गए
अभी दो वक़्त की रोटी नही मयस्सर
आगे का जीवन बहुत भयकारी है

करो नियंत्रण जनसँख्या को तुम
ये सबसे बड़ी बीमारी है ….

रोटी कपड़ा और मकान की
लाखों लोगों को अभी भी तलाश है
फुटपाथों पर जो सोते हैं
वो अभी भी ज़िंदा लाश हैं

आने वाली पीढ़ी की ख़ातिर
की तुमने क्या तैयारी है
करो नियंत्रण जनसँख्या को
ये सबसे बड़ी बीमारी है ….

कवि – अजय बजरँगी

ज़िंदगी एक जंग है यूँ हारा नही करते …

ज़िंदगी एक जंग है ,यूँ हारा नही करते
होकर के मायूस,यूँ घबराया नही करते

इम्तिहाँ का दौर है, हौसलों से काम लो
वक्त बदलेगा जरूर,यूँ मुरझाया नही करते

आंधियां चले ,चाहे कितने ही तूफ़ान आयें
बरगदों के हौसलें,कभी डगमगाया नही करते

जीत जायेंगे हम,ये हमें है विश्वास “बजरँगी”
होंसलों को “अजय”अपने गिराया नही करते

कवि – अजय बजरँगी

जिस मिट्टी के कण कण में राम रहते हैं …

जिस मिट्टी के कण कण में राम रहते हैं
उसे ही ,हम सब लोग हिन्दुस्तान कहते हैं

गंगा ,यमुना ,सरयू ,नर्मदा ,सरस्वती का
पवित्र -पावन नीर इसी धरा पर बहते हैं

हर जीव में भगवान देखते हम हिन्दुस्तानी
जम्बूद्वीपे भारत वर्षे इसे देवभूमि कहते हैं

अतिथि देवो भवः ओर वसुधैव कुटुम्बकम्
जैसे संस्कार हर जन जन के दिल मे रहते हैं

कवि – अजय बजरँगी

कुछ उदासियाँ कुछ थकान ….!

कुछ उदासियाँ कुछ थकान घर लाया
लौट कर जब भी में अपने घर आया

सुबह से शाम हो गयी नोकरी की तलाश में
मुनियाँ को रोते तो बीबी को उदास पाया

पिताजी कहते है कि निकम्मा है “अजय”
माँ ने पुचकारा सही सलामत तो लौट आया

किस से क्या कहूँ ,किस को क्या बतलाऊँ
में अपने सपनों को रास्ते मे कहीं छोड़ आया ..

कवि – अजय बजरँगी

अबकी बाढ़ में …

अबकी बाढ़ में मेरा सब कुछ बह गया
जहाँ मकां था अब बस निशां रह गया

बांध हर बार बनते हैं बनते ही टूट जाते हैं
सरकार निकम्मी है राहगीर कोई कह गया

हर तरफ तबाही का मंज़र देखकर “अजय”
हिर्दय मेरा भी द्रवित हो पानी मे बह गया

शासन , प्रशासन सब मुस्तेद है बचाव में
हर संभव मदद मिलेगी विधायक एक कह गया

लेखक – अजय बजरँगी

दोनों बाजुओं को काट कर …….!!

दोनों बाजुओं को काट कर
एक नया भेष बना दिया
इधर पकिस्तान तो
उधर बंग्लादेश बना दिया ,

में पूछता हूँ छाती ठोक कर
आखिर ऐसा क्यों किया
मेरे एक वतन को तूमने
तीन जगह क्यों बांट दिया ,

भगत सिंह मंगल पांडेय
की आत्मा है पूछती
क्या इसी लिए हमने हँसते हँसते
फंदा फांसी का चुम लिया ,

क्या मजबूरी थी तुम्हारी
आखिर क्या थी चाल
लड़ाई तो “आज़ादी”की थी
तुमने मज़हब में क्यों बाँट दिया ,

लाखों शहीदों की चिताओं
की अग्नि को “अजय”
क्या साक्षी मान कर
तुमने ये सारा फैसला लिया ,

आज भी सब मज़हब रहते हैं
मेरे प्यारे हिन्दुस्तान में
मज़हब के नाम पर बंटवारा
फिर तुमने क्यो कबूल किया ,

पूछता है आज हर हिन्दुस्तानी
बंटवारा क्या जनता को कबूल था
या फिर सत्ता की लालसा में ये
घिनोना पाप अपने सर लिया ….

लेखक – अजय बजरँगी

कुछ ऐसे भी कुछ वेसे भी …

कुछ ऐसे भी , कुछ वेसे भी
सब अच्छे हैं ,”अजय” हो कैसे भी
कुछ कट गए ,कुछ कट जाएंगे
“दिनों” का क्या है , हो जैसे भी..

कुछ खट्टे भी , कुछ मीठे भी
कुछ कड़वे भी , कुछ फीके भी
कुछ आ गए , कुछ आ जाएंगे
“सपनों” का क्या है ,हो जैसे भी…

कुछ प्यारे से , कुछ शरमीले
कुछ हठीले , कुछ नखरीले
कुछ बिछड़ गए , कुछ मिल जाएंगे
“मित्रों” का क्या है , हो जैसे भी…

कुछ जाने से , कुछ पहचाने से
कुछ अपने से , कुछ अनजाने से
कुछ निभ गए , कुछ निभ जाएँगे
“रिश्तों” का क्या है , हो जैसे भी…

कुछ ऐसे भी , कुछ वेसे भी
सब अच्छे हैं ,” अजय” हो कैसे भी…

लेखक – अजय बजरँगी

अजय बजरँगी

होगी तुम्हारे शहर की शान आलीशान …..

होगी तुम्हारे शहर की बिल्डिंगे आलीशान
पर मेरे गांव जैसा एक भी मकान नही है

सुना है तुम्हारे शहर में तहजीब बहुत है
पर मेरे गांव जैसी मीठी सी ज़ुबान नही है

“अजय”हम सब दुःख-सुख में साथ रहतें है
नफ़रत की मेरे गाँव मे कोई दुकान नही है

“बजरँगी”सारे मज़हब -जातियां बैठें एक साथ
चौपाल मेरे गांव जैसी कोई आलीशान नही है

अजय बजरँगी

मेरे राम …..!!

बड़े संघर्षो से आज़ादी हमने पाई है
विराजो रामलला शुभ घड़ी आई है

वाट निहारत सब अयोध्या के वासी
मंगल बेला देखो आज हर घर छाई है

पूण्य भूमि ये भारत भूमि धन्य हुई
भरत शत्रुध्न लक्ष्मण से मिले भाई हैं

साक्षी बने आज हम ,जीवन हुआ सफल
जिंदगी तू भी क्या क्षण जीवन मे लाई है

अब “अजय” और “राम”से क्या माँगू में
“बजरंगी” ने सारी भक्ति तुम पर लुटाई है

लेखक – अजय बजरँगी

सत्ता की ख़ातिर …

धृतराष्ट ने सत्ता की ख़ातिर
अपने सौ पुत्रों को वारा था
पुत्र मोह में कैकयी जिद में
दशरथ जीवन से हारा था…

सत्ता की ख़ातिर युद्ध हुऐ
भाई ने भाई को हरवाया था
भाई विभीषण ने रावण को
सुग्रीव ने बाली को मरवाया था…

सत्ता की ख़ातिर राजाओं ने
मुग़लो का साथ निभाया था
कुछ काली चमड़ी वालों ने
गोरों को राज दिलवाया था …

सत्ता की ख़ातिर कुछ लोगों ने
पता “आज़ाद” का बताया था
भगतसिंह , सुखदेव ,राजगुरु को
फाँसी के फंदे पर झुलवाया था ..

@अजय बजरँगी