कौन मक्कार कहता है ..!

बस  बुराई  को  लिखने  में  ही  बुराई है
और  यही  इस  दुनियां  की  सच्चाई  है,

जब  समुंदर  छू  नही  सकता  तुझको तो
आसमाँ  तेरे  झुक  जाने  में  क्या बुराई है,

कौन मक्कार कहता है,वो औरत बद्चलन है
बेचकर तन आपना,भूख बच्चोँ की मिटायी है

नही पूछता भूखा,कभी भी मजहब रोटी का
पेट भर खाना, उसके लिए सारी ख़ुदाई है,

@अजय बजरँगी

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एक रोज पूछा उस …!

एक रोज पूछा उस मरते किसान ने
में ख़ुशहाल ही कब था हिंदुस्तान में

सत्तर साल से में वहीँ हूँ जहाँ था
जिंदा रहता हूँ बस एक मुट्ठी धान में

तुम महलों में रहकर नियम बनाते रहे
आज भी पानी रिस्ता,मेरे कच्चे मकां में

आज़ादी से आज तक बहुत कुछ बदला
नही बदला एक नियम,मेरे लिए संविधान में

@अजय बजरँगी

वो अजनबी आँखे..!

वो अजनबी आँखें

रह रह कर अब भी
मेरे दिल को
झकझोर जाती हैं
उस बूढ़ी भिखारन की
वो अजनबी आँखे,

कुछ पाने की उम्मीद से
कुछ पाने की चाहत में
शायद मेरी तरफ
देखती रहीं
वो अजनबी आंखें ,

पता नही क्यों
उन आँखों में एक
अजीब सा
अपनापन था जैसे
कोई अपना , मेरा अपना
उन आँखों के पीछे से
मुझे पुकार रहा हो ,

अंतत: में कुछ पैसे देकर
चला आया, परन्तु
न जाने क्यों अब भी
वो बूढ़ी आँखे
मेरे आस पास सी
लगती हैं
भूलना चाहूँ तो भी
भूल नही पाता
रह रह कर दिल में
उतर आती हैं
वो अजनबी आँखे !!

@अजय बजरँगी

जो दिल में हो आपके ….!!

जो दिल में हो आपके सब कह डालिए
ये घृणा के सर्प आस्तीन में न पालिए

लगता है बादलों में अब पानी नही रहा
बरसात जरूरी है तो,आँख से आँसू निकालिए

जरूरी नही कि हर चीज मिल जाए
जिन्दगी को कुरुक्षेत्र बनने से संभालिए

तुम्हारे इस ढँग से ये बाग़बानी नहीं चलेगी
थोड़ा मौसम के अनुरूप खुद को ढालिऐ

@अजय बजरँगी

मरता किसान ही है …!

मरता किसान ही है !!

कभी बाढ़ से
कभी सूखा से

कभी ओलों से
कभी आग के गोलों से

कभी साहूकार के गुंडो से
कभी बैंक के सरकारी मुस्टंडों से

कभी बिचौलियों की बोली से
कभी सरकार की गोली से

हर बार
मरता किसान ही है !!

@अजय बजरँगी

इंक़लाब की बात नही बाग़ी हैं…!

यहाँ हर इन्सान के हाथ मे पत्थर रहता है,
कैसे गले मिलूं उसके हाथों में ख़ंजर रहता है.

इंक़लाब की बात नही बाग़ी है सब के सब,
एक अजीब सा डर अब उनके भीतर रहता है.

समझना नही चाहते या समझया नही किसी ने,
कि हर प्रश्न का उत्तर उस प्रश्न में छिपा रहता है.

कुछ तो पता चले क्यों नाराज रहता है मुझसे,
कैसे पूछोगे उससे हर समय वो तन कर रहता है.

@अजय बजरँगी

वो शख्श जो कल तक …!

वो शख्श जो कल तक,मेरे कत्ल पर मौन था
आज उसके कत्ल पर,पता चला वो कौन था,

रात भर सोचता रहा में,उसके इस अंजाम पर
लगा कि जैसे भरी सभा मैं ,ख़ामोश द्रोण था,

@अजय बजरँगी